माया के लटके झटके

जय सियाराम!
इस कराल कलिकाल में अपने गुरुदेव भगवान् (अग्रमलूक पीठाधीश्वर) समान दीखा नहीं आन।
हां यह सम्भव है स्वयं गुरुदेव ही किसी अपने सदृश जन को उतारना चाहें तो सर्वसमर्थ हैं।
दास को पूज्य जैसा अन्य महात्मा जो आत्मोद्धार के रास्ते पर चलावै, नहीं लक्षित हो रहे। किस जीवन का और किस जन्म का कैसा कब सम्बन्ध रहा पूज्य गुरुदेव से,इस दास का वही जानैं। तीन जन्म के साधू हैं, पूज्य पहाड़ी बाबा ने कहा था अब कोई जन्म नहीं होगा इनका।और गोस्वामी तुलसीदास जी के अवतार भक्तमाली जी ने जिन महापुरुष को गर्भावस्था में रहने पर ही भागवत के मन्त्रों से अभिषिक्त कर दिया था।
जन्म के पश्चात् माता पिता की तरह पालन पोषण किया अध्ययन कराया और प्रत्यक्ष दीक्षित किया।
विन्ध्यनगवासिनी की कैसी कृपा और किस जन्म का पुण्य प्रारब्ध रहा होगा जब साक्षात् दर्शन देने मार्कण्डेय पुराण कथा कथन माध्यम से 2017 में इस अलौकिक विन्ध्याचल की धरती पर गुरुदेव भगवान् पधारे।
न जाने कौन से गुण पर दयानिधि रीझा जाते हैं।

अब मोहिं भा भरोस हनुमंता।
बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं सन्ता।।
जब द्रवैं दीनदयाल राघव ( माता श्री विन्ध्यवासिनी) साधु संगति पाइये।
तेहिं दरस परस समागमादिक पाप रासि नसाइये।


यह विनय-पत्रिका की अमोघ पंक्तियां जैसे इस विन्धेश्वरीदास पर कृपा करने के लिए उतर आईं।
यह पंक्तियां जुलाई ०१ से जुलाई १३ तक चलने वाली ऋषिकेश की एकादश स्कन्ध भागवत कथा सत्संग के सप्तमादिवस के मध्य उमड़ -घुमड़ आईं हैं।
दास के चित्त की दशा वह अन्तर्यामी ही जानैं।
“अपरोक्षानुभूति” जैसे ग्रन्थ की अवतारणा करने वाले श्रीमदाद्य शङ्कराचार्य भगवान् ने
एक जगह कहा- को वा गुरुः यो हि हितोपदेष्टा।
मतलब कि गुरु कौन हैं? उत्तर भी दिया कि जो जीव के परम-चरम हित का उपदेश करके उसे धन्यातिधन्य कर दे। ऐसे ही बिरले गुरुदेव हैं अपने पूज्य मलूकाग्रपीठाधीश्वर।

“उसकी’ “वह’ अनुभूति कराते कहते कथा भक्त भगवत की।
रहते मदमाते अनन्य रस पीते और पिलाते सत की।।
करो कृपा इस विषयी जन पर और न भटके अटके जग में।
सोवै बेखटके प्रभु चरनन तजि माया के लटके झटके।।


गुरुहरिसन्तः शरणम्।
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सन्तन कर संगा

अकारण करुणा वरुणालय भगवान् ने एक और अवसर मुक्त होने के लिए प्रदान किया है। यह अवसर मानव जन्म के रूप में हम समी को प्राप्त है। लेकिन शरीर संसार और तज्जन्य कामनाओं ने हमें भटका दिया है। इसलिए कुछ गुरुशास्त्रसमम्मत बातों पर अडिग रहकर हम यह जीवन कृतार्थ कर सकते हैं।

शतं विहाय भोक्तव्यं,सहस्रं स्नानम् आचरेत्।
लक्षं विहाय दातव्यं,कोटिं त्यक्त्वा हरिं स्मरेत्।।

सैकड़ो काम छोड़कर भोजन करे। हजारों काम छोड़कर स्नान करना चाहिए। लाखों काम छोड़कर दान करे और करोड़ों काम छोड़कर हरि स्मरण करे। हरि स्मरण ही श्रेयस्कर है।

मतलब कि, भोजन, स्नान,दान,हरिस्मरण की उत्तरोत्तर श्रेष्ठता है।

भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते!

उमा कहहुं यह अनुभव अपना।
सत हरिभजन जगत सब सपना।।

उमा राम सुभाव जेहिं जाना।
ताहि भजन तजि भाव न आना।।

राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा।
थल विहीन तरु कबहुं कि जामा।।

बिनु सन्तोष न काम नसाहीं।
काम अछत सुख सपनेहुं नाहीं।।

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनम् आत्मनः।
कामः क्रोधः तथा लोभः तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत्।।

नारायण! कामना ही जगत् में बन्धन का मूल है। इसलिए गुरु शास्त्र सम्मत नित्य कर्मानुष्ठान और नियम पालन करे। स्वयं कोई संकल्प (कामना) न करे।
सब संकल्प श्रीमन्नारायण पर छोड़ दें। जाही विधि राखें राम वाही विधि रहिए। सीताराम सीताराम सीताराम कहिए।

बिनु सतसंग न काम नसाही।
काम अछत सुख सपनेहुं नाहीं।।

नयी नयी नित नूतन आशा।
नहीं जीव की यह परिभाषा।।
आशा तृष्णा काम मुक्ति की।
प्रभु सन्तन के चरण भक्ति की।।

इसलिए प्रथम भगति सन्तन कर संगा।

गुरु-हरि-सन्तःशरणम्
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सब काजते

माघ के कुम्भ मेला में जाने वाले सन्त महात्मा विशेष कोटि के टकसाली महात्मा होते हैं। मेरे जैसे अड़िया खड़िया साधु का वहां क्या काम। दूसरे यह भी कि पुण्यार्जन लाभ का भी कोई लोभ नहीं।
पूज्य भक्तमाली प्रातः स्मरणीय श्रीगणेशदास भक्तमाली महाराज ने कहा।

इसके पहले अपने दीक्षागुरु भगवान् श्रीअग्रपीठाधीश्वर एवं मलूकपीठाधीश्वर ने पूज्य भक्तमाली जी से प्रयाग माघ मेला दर्शन की इच्छा व्यक्त की थी,इसी बात पर पूज्य चरण के अत्यंत सरल उद्गार हैं ये।
यह बात सन् उन्नीस सौ नब्बे के आसपास की है। उक्त प्रसंग पूज्य भक्तमाली जी महाराज की अकिंचनता और सच्चे साधुभाव का उदाहरण है। इन पंक्तियों का लेखक यह विन्ध्येश्वरीदास ऐसे प्रकरण का स्मरण करके रोमांचित हो जाता है।

उस समय अपने मलूकपीठाधीश्वर महाराज जी युवावस्था में थे और श्रीभक्तमाली जी के संरक्षण में पठन पाठन में संलग्न रहा करते थे। अपने मलूक वाले महाराज जी इसके पहले कभी भी कुम्भ मेला में नहीं गये थे,अतः इनकी प्रयाग कुम्भ दर्शन करने की उत्कट अभिलाषा थी।
बात तब की है जब श्रीभक्तमाली जी एवं अपने गुरुदेव, गुरु-शिष्य परम्परा में उस समय सुदामा कुटी, श्रीधाम वृन्दावन में विराजते थे।

यहां एक से बढ़कर एक सन्तों महात्माओं का आवागमन बराबर होता था।
किन्तु पूज्य दादा गुरुदेव कुछ अलग ही स्वरूप के महात्मा थे। अमानी रहकर दूसरों को मान देने वाले,जीवन भर एक इंच भूमि का भी संग्रह न करने वाले,संग्रह-परिग्रह से दूर रहने वाले ऐसे अपने अनन्तश्रीविभूषित गणेशदास भक्तमाली जी महाराज साधुता की जीवन्त मूर्ति थे।

साधुता की मूर्ति थे वे सरल स्वभाव सिद्ध
परम सन्तुष्ट निर्मल अन्तःकरण राजते।
लोकालोका वस्तुओं की कामना की गन्ध नहीं
रहते प्रसन्न सदा औरन के काजते।

वेद वेदान्त न्याय व्याकरण गीता भागवत की शिक्षा में प्रवीण वे अहर्निश विराजते।
श्रीमलूक वाले महाराज के भी महाराज श्रीगणेशदास भक्तमालमाली छाजते।
तुलसी के अनुपम नवावतार ऐसे सन्त,चरनन में परा रहूं छांड़ि सब काजते।

गुरुःशरणम्
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कर्म में अधिकार

अरे नारायण, ब्रह्माण्ड गुरु ने गीता में जो यह कहा कि कर्म करने में अधिकार मात्र है फल ग्राहिता में कदापि नहीं।
साधारण रूप से जो दास की समझ है उसके अनुसार प्रत्येक मनुष्य को मनमानी कर्माधिकार प्राप्त नहीं है अपितु शास्त्र सन्त अनुमोदित कर्म में अधिकार है। क्योंकि यदि कोई मनुष्य है तो वह पहले किसी कर्म में प्रवृत्त होने से पहले समझ ले कि उसके करिष्यमाण किसी कर्म से मानवता आहत तो नहीं होगी।
इस प्रकार सुविचारित शास्त्र सन्त अनुमोदित कर्म करे और उस कर्म के करने में अहंकार नहीं हो तो वही धर्म होगा।
रक्षितः धर्मः रक्षति।
धर्मो रक्षति रक्षितः।

जब हम प्रत्येक कर्म में धर्म की रक्षा करते हुए प्रवृत्त हों तो वह रक्षित धर्म ही हमारी रक्षा करता है और करणीय कर्तव्य कर्म को शास्त्र सन्त अनुमोदित करते हुए उस कृत कर्म में फलानुसन्धान नहीं करने से उसका उत्तम फल वही कर्मदेव/श्रीकृष्ण प्रदान करते हैं। अतः धर्मानुमोदित शास्त्र अनुमोदित और सन्त अनुमोदित कर्म करते फलाकांक्ष नहीं होना चाहिए, इसलिए कि वह सर्वनियामक सत्ता किस सत्कर्म के लिए क्या कितना फल देता है,यह तो वही जाने।
क्यों कि पात्रता परीक्षा के पश्चात् ही फल का नंबर है।

हरिः शरणम्
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जीवोन्मुक्त गति

जो हमें मनुष्य बना दे वही धर्म है।
मनुष्य बनने पर खुले विवेक का मर्म है।।

ऋतु परिवर्तन भौतिक जगत् की क्रान्ति है।
आत्मिकजगत् में अन्तःशुद्धि अन्यथा सब भ्रान्ति है।।

अन्तःकरण है,मन बुध्दि चित्त और अहंकार।
इन सभी में प्रत्येक अग्रिम होता सूक्ष्माकार।।

सद्गुरु प्राप्त होते ही इनकी उत्तरोत्तर शुद्धि।
वाग्देवी करें कृपा हो जाये विशुद्ध बुद्धि।।

इसी विशुद्ध बुद्धि से हम जीव होते हैं सिद्ध।
अन्यथा गमनागमन हो,लक्ष्य रहता असिद्ध।।

अपने गुरुदेव भगवान् मलूकाग्रपीठाधीश्वर।
बोले सुनो,नश्वर शरीर ही मिलाये अविनश्वर।।

इस जीवात्मा को बनना है अकारत्रय युक्त।
नहीं कटे इसके बिन जन्मचक्र ना होंगे मुक्त।।

अकारत्रय है,अनन्यभोग्यत्व अनन्यशेषत्व और अनन्यार्हत्व।
हम सब के जीवन में क्रमशः इसका महामहत्व।।

१- यह जीवात्मा, परमात्मा का भोग्य है।
मतलब किसी और के भोगायोग्य है।।

जैसे संस्कारित धान, चावल, भात बनता है।
तभी वह हम जीवों के खाद्य हो सकता है।।

उसी तरह यह मानव जीव धान्याकार है।
श्रीगुरुकृपादृष्ट्या क्षालित और ही प्रकार है।।

अब यही परिपक्व होकर बनता सिद्ध है।
जैसे कि हम कहते भोजन अब सिद्ध है।।

शुकदेव जी से बोले राजा परीक्षित-
सिद्धोस्मि अनुगृहीतोस्मि
हम संसार के भोग्य आज भी बने पड़े कसे।
इसलिए संसारोन्मुख रह,जन्मचक्र में फंसे।।

२- अनन्यशेषत्व है द्वितीय अकार सम्पन्नता।
जिसकी अनुभूति बिना न जाती है विपन्नता।।

शेष माने हम जीव हैं भगवान् के एक अंश।
इस मान्यता के बिना होता रहता विध्वंश।।

ईश्वर अंश जीव अविनाशी- गोस्वामी जी।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः-गीता

हे राम तवास्मि की द्वितीय है युक्तिसंभावना।
करते कृपा गुरुदेव तभी हो ऐसी दृढ़ भावना।।

३-तृतीय अकारत्रयुक्तत्व होता अनन्यार्हत्व है।
अर्हता है योग्यता और इसका ही महत्व है।।

हम सभी जीव केवल जब हों अनन्यशरण।
श्रीगुरुकरुणया मिले निश्चित श्रीभगवच्चरण।।

इस प्रकार से अकार की होती तीन युति है।
इसी की समष्टि से हो जीवोन्मुक्त गति है।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्
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मानवता गहें

मेरा यहां संसार में है कुछ नहीं मानूं अटल।
संसार प्रतिपल बदलता है जा रहा यह भी अटल।।

इसलिए बीते समय पर शोक करना मूर्खता।
किस कर्म की है अफलता या सफलता नहिं देखता।।

पूर्व जन्मों के करम वश दुःख सुख सब भोगता।
यह भी न है मद किया हमने या किया हमने खता।।

चलते हुए भोजन क्रिया सब शास्त्र करते हैं निषिध।
हंसते हुए कुछ बोलना संभव नहीं होता विविध।।

है श्रवण हित दो कान इनका है रहस्य यही प्रभो।
जब बोलना अनिवार्य हो तब ही अलप बोलूं विभो।।

ऋषि शास्त्र वेद पुराण पथ का चयन कर बढ़ते रहें।
है पाप क्या है पुण्य न विचार कर मानवता गहें।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्
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कली ज्योतित खिले

त्याग में अनुभव करो आनन्द की सीमा नहीं।
संसार की सब पद प्रतिष्ठा है हमारी मां नहीं।।

जब छोड़ सब उन्मुक्त हो ऐसी कहीं गरिमा नहीं।
यह आत्म अनुभव भव पराभव करैं गुरु किरपा यहीं।।

यह जीव जीवन चले सत्पथ जब मिले श्रीगुरू वही।
है परम परमानन्द सच्चित् करुण करुणा कण सही।।

हैं “उन्ही” के भेजे हुए सब दिव्य अवतारी पुरुष।
यदि हम करें स्वीकार उनको तुरत जाये सब करुष।।

इस आत्म विस्मृति का स्मरण हम कौन हैं क्या हो गये।
करने कराने यही अनुभव सद्गुरू नूतन नये।।

छूटें असद् व्याहार औ व्यवहार सत् पथ हम चले।
वह एक आलक्षित चरम पाकर विषय वसना जले।।

यह तब हुआ जब मुक्त परमारथ रथी छाया मिले।
कट,बन्ध बन्धन धन धरा,आत्मिक कली ज्योतित खिले।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्
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हरी की

आत्मा का बोध हो क्या स्वतः प्रमाण्य से।
अथवा यह सम्भव है परतः प्रमाण्य से।

गुरुओं ने कहा यह सम्भव तभी है नाथ।
जब मिल अकिंचन नामदेव ज्ञानदेव का साथ।

इनकी बानी में डूब इनकी कृपा का याचन।
पाते हैं पाये हैं पावेंगे आरत मन।।

यही साधु सन्तजन इनकी चरनों की धूल।
धारण करें जो मन विषय विष जाये भूल।।

कहीं नहीं गये नामा ज्ञान सूर तुलसी कबीर।
मिलते हैं आज भी प्रत्यक्ष होवे हृदय पीर।।

आरत हो चाहे जो चाहना न और की कर।
सब कुछ समरपन सन्तन चरनन में धर।।

ऐसी ही मति बनी दास विन्ध्येश्वरी की।
नष्ट मोह कृपा मोहन गुरु नारायण हरी की।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्
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भरोसो जाहि दूसरो सो करो

भाई जी, हमारी बड़ी समस्या है।

हम हम करि धन धाम संवारे बचे न काल बली ते।
मन पछितैहैं अवसर बीते-

पूज्य गोस्वामी तुलसीदास जी विनय पत्रिका में।
दास ने सभी पूज्य जनों से सुना है और भगवत्कृपा से पढ़ा भी है कि यह अहं जाता नहीं और बारम्बार भवबन्ध में जकड़े रहता है।
किसी अहंशून्य महत्पुरुष की कृपा बस हो जाय तो काम बन जाय।
मन बुद्धि चित्त और अहं में क्रमशः एक से आगे एक सूक्ष्मतर है।
इसी अहं से मम जुड़ा है।
देह भाव वही मेट सकें जिन सन्तन कौ मिट गयो है।
सबके देह परम प्रिय स्वामी।
अब जब परम प्रिय राम जी हो जायें, हनुमानजी जी कृपा करैं।
सन्त भक्त जन दया का पात्र बना लें।

राम नाम के पटतरे देबे को कछु नाहिं।
क्या लै गुरु सन्तोसिये हौंस रहि मन माहिं।।
मो को तो राम को नाम कलपतरु कलि कल्यान फरो।
भरोसो जाहि दूसरो सो करो।


हरिगुरुसन्तः शरणम्
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गुरु गोविन्दहिं अनुसर

गुरु गोविन्द कृपा का अनुभव।
काटेगा यह छ्न्द बन्द भव।।
ऐसी कृपा नाथ जन जानहुं।
एहि के बल जग जीवन मानहुं।।
करहिं करावहिं सो सोई होवै।
दास आसरे उनके सोवै।।
जिनको और भरोसो मन में।
करै सोइ हर हर इक छन में।।

दास भरोसे गुरु गोविन्दहिं।
काटत संसारी छल छन्दहिं।।
मेरो मन श्रीगुरुचरनन महिं।
लागै अवसि कृपा उनकै जहिं।।
यदि अन्यथा होत यहिं दासा।
होवत शरणागति कै नासा।।

अतः चरण महिं परा रहै यहिं।
दास बिन्देसरि सुमिरै एहिं कहि।।
अब तौ यह निश्चय जीवन कर।
चलै श्वास गुरु गोविन्दहिं अनुसर।।

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